यात्रा संस्मरण
यात्रा संस्मरण
रानीघाटी:कुछ नया मिला,कुछ नया देखा
हिंदी साहित्य सभा में आज बैठक में ग्वालियर के सभी युवा साहित्यकारों के साथ मुझे कुछ नया सीखने को मिलेगा इसीलिए मैंने जाने का मन बना लिया, और साइकिल उठाकर चल दिया। हिंदी साहित्य सभा की पहली बैठक में मैं आज उपस्थित होने जा रहा था और मुझे ये भी नहीं पता था कि इस बैठक का उद्देश्य क्या है। मैं सभा में पहुंचा बहुत सारी साहित्यिक बातें हुई लेकिन सबसे अच्छी बात सामने ये आई कि हिंदी साहित्य सभा युवा साहित्यकारों को साहित्यिक यात्रा पर जाने का मौका देगी और उसके साथ-साथ नवीन कलाकारों को युवा सम्मेलन में भाग लेने का मौका भी मिलेगा, मेरे लिए ये दोनों ही महत्वपूर्ण थी क्योंकि मुझे घूमना बहुत पसंद है और साहित्य के साथ यात्रा तो सोने पर सुहागा होगा बहुत मस्ती करेंगे और दूसरी बात युवा सम्मेलन की तो यहां भी संगीत कविता गीत की बात आती है तो वहां मेरा मन अटका ही रहता है। मैं बहुत उत्साहित था इस साहित्यिक यात्रा के लिए, मैं यही सोच रहा था कि ये यात्रा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा होगा तभी मैडम ने कहा कि हम इसी रविवार को यात्रा पर जाने वाले है घाटीगांव में एक एतिहासिक स्थान है रानी घाटी वहां पर संत निवास के साथ साथ गौ शाला भी है, जो जाना चाहते है वो सब अपना नाम लिखवा सकते है। बड़ी प्रसन्नता के साथ मैंने हां किया।
रविवार को सुबह से ही उत्साहित हुए जा रहा था। मैंने गोविंद का भी नाम लिखवा था तो गोविंद भी जाने को तैयार था। हिंदी साहित्य सभा में पहुंचकर गोविन्द का परिचय मैडम से करवाया और कहा कि ये गोविंद है हास्य कवि जबकि वो कोई हास्य कवि नहीं था। मैडम ने भी कहा कि हास्य कवि है फिर तो सबको हसाएगा बस में, मैंने भी कहा हां। सब लोग चलने के लिए तैयार थे सब बस में जाकर बैठकर गए और हम रानी घाटी की ओर रवाना हुए।
जैसे ही बस का चलना शुरू हुआ अंकित भैया ने सभी को स्वल्पाहार के रूप में खाने के लिए समोसे दिए मुझे इतनी उत्सुकता हो रही थी उस ऐतिहासिक स्थान पर जाने के लिए और वहां पर जाकर उन सभी साहित्यिक चीजों के बारे में जानने के लिए कि मैंने वो समोसा ही नहीं खाया मैंने उसे गोविंद को दे दिया, यह यात्रा साहित्य के लिए समर्पित थी और मैं हमेशा ही साहित्य के लिए तत्पर रहता हूं।
मैं बस में बैठा बैठा सोच रहा था कि इस साहित्य की यात्रा का जो मजा लेना है वह मजा अभी से स्टार्ट करना चाहिए इसे इतना रोमांचक बनाना चाहिए कि सारी उम्र हम इसे कभी भूल न पाएं मैं सोच ही रहा था कि कहां से शुरू करें तभी अंकित भैया आए और उन्होंने कहा कि हममें से कोई हास्य कवि है जो हमारे बीच उपस्थित है तो आप सभी का मनोरंजन करवाने के लिए वह हास्य कवि हमारे बीच आएगा और अपनी कुछ पंक्तियां रखेगा मैं और गोविंद बड़े आश्चर्यचकित हो गए गोविंद के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगी मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था। वह जबरदस्ती गया और उसने कोशिश की कुछ बातें हास्य में करने की कुछ कविताएं स्कूल की, कुछ प्यार मोहब्बत की कविताएं सुनाई सबसे ज्यादा हंसी मुझे आ रही थी। कुछ समय यूं ही चलते चलते कुछ गुनगुनाते गुनगुनाते सर ने कहा कि आरंभ है प्रचंड गाना किसको आता है कौन गा सकता है इसे मैंने सोचा कि यही सही समय है मस्ती करने का मस्ती शुरू करने का इसलिए सबसे पहले हाथ मैंने उठा लिया और मैंने कहा कि मैं गाऊंगा गाना और सर के साथ वह गाना स्टार्ट किया स्टार्ट करते-करते हमने दो-तीन गाने यूंही गुनगुनाए फिर धीरे धीरे सब लोग जुड़ने लगे और देखते ही देखते पूरी बस और बस के सभी साहित्यिक यात्री मिलकर मस्ती के साथ गाने लगे और जिस पल की जिस क्षण की जिस मस्ती की तलाश में मैं इस साहित्य की यात्रा में आया था वह पल यही था ऐसे ही गाते गुनगुनाते हुए मस्ती के साथ कब हम लोग रानी घाटी पहुंचे पता ही नहीं चला, रानी घाटी पहुंचकर मुझे ऐसा लगा कि यार थोड़ा दूर जाना था यह बहुत पास का क्षेत्र चुन लिया है मैडम ने हमें थोड़ा सा दूर जाना था जिससे की मस्ती और की जा सके जिससे और ज्यादा आनंद लिए जा सके।
वहां पर पहुंचकर सबसे पहले हमने रानी घाटी पर स्थित मंदिर में जाकर श्री राधा कृष्ण जी, श्री सीता राम जी, हनुमान जी, और भगवान शिव जी के मंदिर के दर्शन किए और वह पर संतो की रसोई देखी और सबसे विचित्र बात यह थी कि वहां पर काले गेहूं नीचे धूप में सूख रहे थे सभी ने काले गेहूं को हाथ में लेकर देखा और एक स्वामी जी ने हमें बताया कि यह गेहूं सामान्य गेहूं से अलग इसलिए है क्योंकि सामान्यतः हम गांवों में आधुनिक कृषि को महत्व देते है लेकिन यहां पर हम लोग प्राकृतिक रूप से ऑर्गेनिक कृषि का उत्पाद करते है।
इसके बाद हम लोग गौ मुख की तरफ आगे बढ़े, गौ मुख से थोड़ा थोड़ा पानी बह रहा था और वहीं हमें हमारा एक छोटा भाई देव मिला जो हमें इन सब के बारे में जानकारी देने लगा, देव बहुत दिनों से संतों की सेवा करने के लिए यहीं रह रहा था। उसने बताया कि ये गौ मुख बारिश में बहुत तेज चलाता है और ये झरना भी इसी से चलता है हम सब लोग यहीं पर आकर नहाते है। यहां पर हर पत्थर अपने आप में जैसे कोई विशेष महत्व रखता है और यहां पर छोटे कंकर से लेकर विशाल पाट तक हर पत्थर पर कुछ न कुछ विशेष था, जैसे कहीं पर हमें गणेश जी की प्रतिमा का उत्कीर्ण मिला, कहीं विशेष चित्रात्मक कारीगरी और बहुत से शैल शिल्प भी देखने को मिली, हमें बताया गया की ये सभी पत्थर मत्वपूर्ण है लेकिन यहां इस जंगल में इनका ज्यादा काम नहीं है इसलिए इन बड़ी बड़ी पाटों का चबूतरा बनाया गया है और बहुत सारे कीमती पत्थर यूंही बेकार पड़े हैं। कुछ छोटी छोटी गुफाएं और कंदराए भी हमें पहाड़ की तरफ देखने को मिलीं जिसमे सब अंदर जा जा कर फोटो खिंचवाने में व्यस्थ थे उन गुफाओं में से निकलते सेल्फीधारियों को देखकर लगता था कि कोई महात्मा वर्षो तपस्या करने के बाद गुफा से बाहर निकल रहे हो, मान्यता है कि ये गुफाएं भी जानबूझकर बंद की गई है।
गौ मुख से थोड़ा ऊपर चढ़ने के बाद हम उस पुरानी खंडहर में पहुंचे जो किसी हवेली से कम नहीं था लेकिन अब ये तहस नहस पड़ा हुआ था। देव ने हमें बताया कि ये पूरा क्षेत्र बहुत पहले संतो को दिया गया था तभी से यहां पर संत महात्मा साधना के साथ कृषि भी करते है, कल शिवरात्रि को पूरे 24 घंटों तक यज्ञ चला जिसमे सभी ने बिना सिले सूती कपड़े धारण किए थे।
इसके बाद हम सभी आगे तालाब की तरफ गए वहां कुछ देर फोटो सेल्फी करने के बाद हम गौशाला की तरफ आगे बड़े और गायों के खाने लिए प्यार के बड़े बड़े पहाड़ हमने वहां पर देखे जिसमे से रोज थोड़ा थोड़ा प्यार गायों को डाला जाता है। गायों के गोबर से खाद बनाना और गोबर गैस बनाना जैसे बहुत से कार्यों को समझाया गया। इसके बाद हम सब गौशाला से होते हुए। वापस वही महल में आ गए जहां से शुरू किया था। रसोई में जाकर सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। काले गेहूं की पूड़ी बहुत ही स्वादिष्ट थी गाय के दूध से बनी खीर जैसे की रबड़ी को पीछे छोड़ रही थी पेट भर के खाने के बाद मैं मंदिर में आ गया।
हमें बताया गया था कि प्रसाद के बाद हम कीर्तन और भजन भी करने वाले है मुझे इसी पल का इंतज़ार था तो मैं सबसे पहले भोजन करके वहां पहुंच गया जहां पर हरमोनियम और ढोलक बगैरा रखी हुई थी। वहां पहुंचकर मेरी नज़र ऊपर छत पड़ी वहां पर कुछ लाल रंग वाली कुर्सियां लाइन से लगी हुई थी, बिना कुछ सोचे मैं अपने आप वहां पहुंच गया ऊपर जाकर लगा कि शायद ये गलत है बिना आज्ञा के मैं ऊपर आ गया तभी मुझे स्वामी जी दिखे, एक लंबा हॉल जिसमें एक तरफ तखत बिछा हुआ है जिसपर एक स्वामी जी भगवा ओढ़े हुए बैठे है और सामने कतार से कुर्सियां लगी हुई है कुर्सी पर एक और स्वामी जी बैठे हुए है व पैंट शर्ट में एक सज्जन लैपटॉप लिए बैठे है वे कुछ बातें कर रहे थे। मैंने जाकर स्वामी जी प्रणाम करते हुए अपना मस्तक उनके चरणों में रख दिया। स्वामी जी ने सामने कुर्सी पर बैठने को इशारा किया तो मैं वहां पर जाकर बैठ गया। स्वामी जी के चेहरे पर वो तेज़ था जिसे देखने के बाद मेरी नज़रे उनको ही निहारती रही, स्वामी जी को देखकर मुझे मद्दा खो वाले महाराज जी की याद आ गई मैंने महाराज जी के बाद इतना ओज और तेज़ से परिपूर्ण पुरुष स्वामी जी को ही देखा था। मैंने स्वामी विवेकानन्द जी को साक्षात कभी नहीं देखा और मुझे लगता है कि स्वामी पुष्करानंद जी स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमूर्ति है। स्वामी जी मुझे देखकर कुछ सोचकर कहते है कि हम पहले कभी मिले है क्या? मैंने कहा - नहीं! ओह मुझे लगा मैंने आपको देखा है कहीं स्वामी जी इतना कहकर चुप हो जाते है। मैं उस हॉल में इधर उधर नज़रे घुमाकर देखता हुं तो स्वामी जी के पूछे एक छोटा कमरा है एक अलमारी में गीता, रामचरितमानस जैसी आध्यात्मिक पुस्तकें रखी हुई है। स्वामी जी कुछ कहने ही वाले थे तभी अंकित भैया मंदाकिनी मैडम और सभी सहयात्री उस हॉल में उपस्थित हो गए। स्वामी जी ने बैठने को कहा तो स्वामी जी के समक्ष बैठने में मैडम को कुछ असहज लगा इसलिए हम सब ने कुर्सियां बाहर निकाल दी और नीचे बैठ गए, मैडम ने सभी से स्वामी का परिचय करवाया विद्यार्थियों को देखकर स्वामी जी प्रसन्न हुए और वार्तालाप शुरू किया स्वामी जी ने सबसे पहला प्रश्न किया कि " सबसे पुराना साहित्य कौन सा है " ? किसी ने उत्तर दिया 'ऋग्वेद' फिर तो स्वामी जी ने एक दम वेदों से लेकर कुरान और बाइबल तक का ज्ञान हमारे बीच रख दिया, सनातन धर्म से लेकर इस्लाम और यहूदी तक सबका इतिहास हमें बताया, हम सब लोग सुनकर दंग रह गए कि इतनी कम उम्र का कोई इतना ज्यादा तीव्र ज्ञानी हर विषय के जिज्ञासु और तेजस्वी व ओजपूर्ण व्यक्तित्व हमारे सम्मुख उपस्थित था। स्वामी जी की इन सब बातों से लग रहा था कि हम स्वामी विवेकानन्द जी को सुन रहे हो। इतना अच्छा वक्ता जो बिना बिना रुके हमसे बातें किए जा रहा था एक भी शब्द पर वो अटके नहीं वो जितनी अच्छी संस्कृत व हिंदी बोल रहे थे उतनी ही अच्छी अंग्रेजी भाषा का भी प्रयोग कर रहे थे। मैं हमेशा से दूसरों को देखकर सुनकर ही सीखता रहा हूं कोई भी अच्छे से अच्छा वक्ता भी बीच-बीच में कभी-कभी रुकता है और सोचता है लेकिन स्वामी जी एक पल भी न ठहरे जैसे गंगा अपने गंतव्य तक पहुंचने तक कहीं भी नहीं रुकती वैसे ही स्वामी जी की ज्ञान गंगा कहीं न ठहरी। संगीत, साहित्य, इतिहास, विज्ञान, अंधविश्वास, धर्म जैसी बहुत बातें हुई कुछ बातें ऐसी भी थी जो मुझे समझ न आई लेकिन बहुत सारी बातें सदा के लिए मनमस्तिस्क में उतर गईं। स्वामी जी की मधुर वाणी के लिए हम ज्यादा से ज्यादा देर तक वहां रुकना चाहते थे परंतु हमें घर भी पहुंचना था। 3 घंटे कब बीत गए हमे पता भी नहीं चला। जाते समय मैडम ने बारी-बारी से सभी का परिचय स्वामी से करवाया सबसे अंत में मेरी भी आई और हम जाने लगे, लेकिन मेरा मन जाने का बिल्कुल नहीं था। करीब 4 बजे का समय हो गया था। स्वामी जी के साथ एक ग्रुप फोटो के बाद हमनें स्वामी जी से जाने की आज्ञा मांगी।
हमारा छोटा भाई देव हमें विदा करने के लिए बस तक आया। सभी बस में जाकर अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए और बस वापस ग्वालियर की तरफ रवाना हुई। मैं बस में बैठ तो गया था लेकिन मेरा मन वहीं स्वामी जी के पास ही था। जिस मस्ती को मैं आनंद मानकर आया था उससे कई ज्यादा आनंद स्वामी जी की बातों में दिखा। स्वामी जी से बातें करते-करते हम लोग कीर्तन करना भूल ही गए थे लेकिन इसका बिल्कुल भी मलाल नहीं था मन में। स्वामी जी से एक और बार मिलने की इच्छा जागृत हुई मन में तो अंकित भैया से पूछा उनके बारे में।
जिस तरह आए थे उसी तरह जाते समय भी बस में गाते गुनगुनाते मस्ती के साथ हम ग्वालियर पहुंचे।
सुबह घर से साहित्य सभा तक जाते समय मैंने मोबाइल देखा तो उसमे चार्ज कम था मैं सोच रहा था कि मोबाइल स्विच ऑफ हो जाएगा बीच में, पूरे दिन कैसे चलेगा तो मैंने गोविंद से चार्जर भी मंगवाया था, लेकिन आज बिना मोबाइल के पूरा दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला और चार्ज भी बचा हुआ था। घर पहुंचकर रात में सोते समय भी स्वामी जी मेरे जहन में थे। उनका ज्ञान देखकर मुझे लगा कि किताबें हमें सब कुछ दे सकती है लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद।
इस साहित्यिक यात्रा के कुछ फोटोज़ मैं यहां पर भी साझा कर रहा हूं -
बस में की गई मस्ती की वीडियो <youtube>
मैंने सभी सेल्फी फोटो और वीडियो स्टेट्स पर लगाए और लिखा " ये साहित्यिक यात्रा सदैव याद रहेगी धन्यवाद हिन्दी साहित्य सभा " 🙏
- विकास बघेल-
विद्यार्थी,स्नातक तृतीय वर्ष
माधव महाविद्यालय,लश्कर
मीडिया प्रभारी - राष्ट्रीय कवि संगम ग्वालियर
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें